Monday, November 08, 2010

उसकी हथेली और हमारी बात

.......................................
उसने हाथ बढ़ाया मेरी ओर
मैंने भी बढ़ कर हाथ मिलाया।

उसकी नर्म और गर्म हथेली बच्चों की सी थी।
मैंने हथेली भर कर उसका हाथ थाम लिया।

हम बात कुछ और कर रहे थे,
सोच कुछ और रहे थे,
पर हम साथ साथ समझ रहे थे,
कि यूँ हाथ मिलाना अच्छा लगता है।
रस्ता रोक कर यूँ बातें घुमाना अच्छा लगता है।

फिर दोनों ही झेंप गये।
संक्षेप में मुस्कुरा कर अपनी अपनी दिशा हो लिये।

किसी बहाने से अचानक मैं पलटा,
और वह जा चुकी थी।

कुछ सोच कर वह भी पलटी होगी,
और मैं जा चुका होउंगा।

उस रास्ते पर अब रोज़, उसी समय मैं आता हूँ।

8 comments:

आशुतोष पार्थेश्वर said...

मोहक और सुंदर ! मेरी बधाई !

डॉ. नूतन - नीति said...

sunadr.. kal aapki is post ko mai charcha manch pe rakhuni.. aabhaar

niraj sah said...
This comment has been removed by the author.
niraj sah said...
This comment has been removed by the author.
niraj sah said...

dil ko choo lene wali es kavita ne beete dino ki yaad dila di...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

अनुपमा पाठक said...

nice!

Richa said...

superb!!!! Babaji aap ki poem ke liye mere pass words nahi hai bahut pyaari hai.....ankahe prem ki bahut hi sundar abviyakti karta hai aapki poem.