Saturday, July 08, 2017

मेरा घर

एक ज्योतिषी आए थे मेरे घर।
मेरे कुंठित भविष्य पर वास्तु दोष बता कर चले गये।
भई, यह बाबरी मस्जिद थोड़े ही है,
मेरा घर है, वह भी किराये का।

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Friday, September 04, 2015

हत्यारे

हत्यारे क्यों सामने नहीं आते हैं ?
क्यों अदालत में वे हत्या के आरोप से करते हैं इंकार ?
जबकि कर लें स्वीकार तो संभवतः सम्मान ही हो उनका. 

मैं तो वैसे भी उन्हें फूल देना चाहता हूँ कि जाकर उनकी समाधि पर चढ़ा दें,
जिनका ज़िंदा रहना उनके लिए हानिकारक था.
आख़िर एक फूल से क्या डर है उन्हें ?
चाहें तो उसकी महक की जाँच करवा लें.
उससे किसी का कोई नुकसान नहीं होता.

क्यों हत्यारे अपने बचने का हर उपाय करते हैं ?
हर तर्क गढ़ते हैं ?
हमने तो लिख कर दिया है कि हम इतिहास में कुछ भी उनके ख़िलाफ़ नहीं लिखेंगे.
न ही कोई साहित्य गढ़ेंगे किसी डिस्क्लेमर के साथ.
हमने तो राजपाट भी दे दिया और अपने घर का दरवाज़ा भी खोल रखा है,
आओ प्रभु हमारे घर आओ और हत्या करो हमारी.
फिर भी न जाने क्यों वे अँधेरे में ही आते हैं और दिन में छिप जाते हैं. 

Sunday, May 11, 2014

लकड़ सुंघवा


रात में भी लोगों में रहने लगा है अब,
लकड़-सुंघवा का डर।

[लकड़ी सुंघा कर बच्चे को बेहोश करके बोरे में भरकर ले जाने वाला।]

1

लू के मौसम में,
जब सुबह का स्कूल होता है,
दोपहर को माँ अपने बच्चे से कहती है,
“सो जा बेटा, नहीं तो लकड़-सुंघवा आ जाएगा”।
“माँ, लकड़-सुंघवा को पुलिस क्यों नहीं पकड़ लेती?”
“बेटा, वह पुलिस को तनख़्वाह देता है”।

शाम को जब बच्चा सो कर उठता,
तो मान लेता है कि लकड़-सुंघवा आया
और बिना बच्चा चुराये चला गया।

पर एक रोज़ बस्ती में सचमुच आ गया लकड़-सुंघवा। पर रात में।
पूरनमासी की रात थी, पत्तों की खड़ खड़ पर कुत्तें भौंक रहे थे।
बिल्ली सा वह आया दबे पाँव।

सोये हुए लोगों की छाती में समा गई उसकी लकड़ी की महक।
जो भाग सके वे अँधे, बहरे, लूले, लंगड़े हो गये,
लेकिन ज़्यादातर नीन्द में ही सोये रह गये।

और धीरे धीरे जमने लगी धूल बस्ती पर।
जैसे जमती है धूल यादों पर, अदालत की फ़ाईलों पर,
पुलिस थाने की शिकायत पुस्तिका पर।

एक दिन धूल जमी बस्ती, मिट्टी में दब गई गहरी।
समतल सपाट मैदान ही केवल उसका गवाह था।

2     

ज़मीन के अन्दर दबी बस्ती उभर आई अचानक।
जैसे पुराना कोई दर्द उखड़ आया हो ठंड के मौसम में।

पचीस सालों की खुदाई के बाद निकले कुछ खंडहर, कंकाल, साँप, बिच्छू।
कंकालों ने तत्काल खोल दीं आँखें,
खुदाई करने वाले सिहर उठे और फिर से उन पर मिट्टी डाल दी।

पुरातत्ववेत्ताओं ने दुनिया को बताया,
कि बस्ती प्राकृतिक आपदा से दब गई थी नीचे।

अब किसको इसकी सज़ा दें और किसको पकड़ें धरें।

इतिहास लिखने वालों ने अंततः वही लिखा,
जो पुरातत्ववेत्ताओं ने बताया।
खुदाई पूरी होने के इंतज़ार में खड़े लोग,
खड़े रह गये।

उन्होंने उतरना चाहा हालांकि अन्दर,
कि तभी शोर उठा,
लकड़-सुंघवा आया, लकड़-सुंघवा आया !!!!
लकड़-सुंघवा आया, लकड़-सुंघवा आया !!!!

संघर्ष के स्मारक

अब नींद लेता हूँ भरपूर।  

लम्बे संघर्ष के बाद
अब पता है, नहीं मिलेगा इंसाफ़।

अब तो इतना ही काफ़ी है कि ये देह,
संघर्ष के स्मारक, बच जायें।
क्या पता कभी इनमें जान फुंक जाये।  

जगह मिली तो करवट ले लेंगे।  
तब तक चित चादर तान सोयेंगे।

ठंड बढ़ रही है और अलाव भी धुंध ही पैदा कर रहा है घना। 

दर्दनाक घटनाएँ

दर्दनाक घटनाओं पर कविता नहीं लिखी जा सकती।
संभव ही नहीं है।
मेरा मतलब है कि विश्वसनीय नहीं होगा।
कवि के लिए भी कि उधर पुलिस थाने में बलात्कार की ऐसी घटनाएँ घट रही हैं कि महिला के अन्दर से कई अंग बाहर निकल आएँ और आप कविता रच रहे हैं, और पाठक के लिए भी, कि उसने शहरों में निम्न मध्यम वर्गीय जीवन बिताया है, उसके अनुभव संसार से जुड़ ही नहीं पाएगी वह कविता जो सोनी सोरी के लिए लिखी गई है या कवासी हिड़में के लिए।

दर्दनाक घटनाओं की रिपोर्टिंग भी नहीं की जा सकती।
मेरा मतलब है कि कौन लिखेगा रिपोर्ट।
न पुलिस, न रिपोर्टर।

जिस मीडिया का हेडलाईन भी बिका हुआ है और जो उसके साथ मिल कर लड़कियों की सुरक्षा का चला रहा है कैम्पेन जो जंगल का जंगल काटने में लेता है उसी पुलिस की मदद जो बलात्कार करना कर्तव्य समझती है। जिसकी देश भक्ति तभी जागती है जब कोई ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ लगाता है।

दर्दनाक घटनाओं पर कभी इंसाफ़ भी नहीं मिल सकता।
मेरा मतलब है कि कौन करेगा इंसाफ़।
जब गवाहों से पूछा ही नहीं जाएगा सवाल,
जब तथ्यों को रखा ही नहीं जाएगा सामने, हालांकि ऐसा भी नहीं है कि जजों को कुछ मालूम नहीं है, तो कैसे होगा इंसाफ़।
हर फ़ैसले के पहले जज अपनी खिड़की के पर्दे हटा एक बार लेता है जन-भावना की टोह फिर लिखता है इंसाफ़। और जज की खिड़की से जो दिखता है जन, उसे केवल अपनी ही ख़बर है।

बिना अनुभव के दर्दनाक घटनाओं के पक्ष में नहीं निकलेगी आवाज़।
उन घटनाओं की यह धमकी है कि आप इंतज़ार करें वैसी ही घटनाओं का।
इंतज़ार करें कि आपके साथ भी बलात्कार हो।      

एक पेंटिंग

एक दंगाई हाथ जोड़े खड़ा है.
दंगे में मारे गए लोग हाथ जोड़े खड़े हैं.

एक आतंकवादी हाथ जोड़े खड़ा है.
धमाकों में मारे गए लोग हाथ जोड़े खड़े हैं.

एक भ्रष्टाचारी हाथ जोड़े खड़ा है.
अदालत में बलात्कारी हाथ जोड़े खड़ा है.

पुलिस और पॉलिटिशियन के भेस में,
समूचा अपराध जगत हाथ जोड़े खड़ा है.
देश की जनता मूक बधिर खड़ी है.

एक कुत्ते का पिल्ला असमंजस की स्थिति में 
कभी आगे कभी पीछे भाग रहा है. 
उसके सामने से गाड़ियाँ सायं सायं निकलती जा रही हैं.

एक निवेदन

जिसने मुझे मारा,
आपको पूरा भरोसा है कि वह आपको नहीं मारेगा.
आप मेरी बात सुनने को भी तैयार नहीं हैं.
आप मुस्कुराते हैं मेरी शिकायत पर,
और आपके बच्चे हँसते हैं
दरवाज़े के पीछे जाकर मुझ पर.  
ऐसा मनोरंजन आपको और कहीं नहीं मिलता है.

अब क्या मैं आपके भी मारे जाने का इंतज़ार करूँ ?
क्या मेरा मारा जाना कम पड़ता है आपके लिए ?
क्या मैं भी इंतज़ार करूं एक बड़ी त्रासदी का,
मूक बधिर बनकर देखने के लिए ?

ख़ंजर आपके भी सीने में उतरे यह ज़रूरी तो नहीं !  
दर्द से आप भी चीख़ें यह ज़रूरी तो नहीं !
आप भी बेघर हों, सुबह शाम छाती पीटें यह ज़रूरी तो नहीं !
सारे खेल आपके साथ भी हों यह ज़रूरी तो नहीं !

क्या कर दूँ कि मुझे शत्रु बताने वालों की चाल आप समझ लें पहले ही
और अपनी बारी को रोक दें आने के पहले ही.

Sunday, February 02, 2014

मेरी भैंस खो गयी.

जनता करती हाहाकार.
भागे सब घर छोड़ छाड़.
क्या करूं मैं ऐसी खबरें जान कर.
मेरी भैंस खो गयी, मेरी भैंस खो गयी.

लूट पाट है, खड़ी खाट है.
पगड़ी धोती उतर गयी.  
क्या करूं मैं ऐसी खबरें जान कर.
मेरी भैंस खो गयी, मेरी भैंस खो गयी.

चारा खा गए, भूसा खा गए.
चरखा चादर सबको खा गए.
क्या करूं मैं ऐसी खबरें जान कर.
मेरी भैंस खो गयी, मेरी भैंस खो गयी.

खेत बिक गया, धान बिक गया.
बापू का सामान बिक गया.
क्या करूं मैं ऐसी खबरें जान कर.
मेरी भैंस खो गयी, मेरी भैंस खो गयी. 

Sunday, September 11, 2011

हम बारिश में भीग कर आए।

छाता लेकर निकलना तो इक बहाना था,
असल में हमको इस बारिश में भीगना था।

हम लम्बे मार्ग पर चल रहे थे,
ताकि देर तक भीग सकें साथ साथ....
और ऐसा ही इक मार्ग चुना,
जिस पर और किसी के आने जाने की संभावना क्षीण हो।

लम्बी दूरी के बाद हमें दिखा
एक पेड़ के नीचे,
एक चूल्हा और एक केतली लिए, एक चाय वाला।
एक गर्म चाय हमने पी। 
हम भीग रहे थे और हमारे बीच की हवा गर्म थी।  
हमारे अन्दर भाप उठ रही थी।

हमने पहली बार एक दूसरे को इतना एकाग्र हो,
इस क़दर साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ देखा था बिल्कुल भीतर।    

उस क्षण आँखों के सिवा और कुछ नहीं रहा शेष इस सृष्टि में।
बाक़ी सब कुछ घुल रहा था पानी में।   

Sunday, August 14, 2011

अतीत


जब मुझे वह छोड़ के जा रही थी,
उसके लौटने की उम्मीद में उसका मन मेरे पास ही खड़ा रह गया।
पर वह जा चुकी थी पहाड़ी के उस पार,
जहाँ सूरज ढलता है शाम का।

बरसों बाद आज उसने लौटना चाहा,
पर इस बार उसके मन ने ही उसे रोक दिया।


बरसों बाद आज,
बहुत दूर निकल आने के अहसास ने
उसकी हड्डियों में जो सिहरन पैदा की
वह उम्र की झुर्रियाँ छोड़ गईं। 

बहुत दूर निकल आने का अहसास,  
हमेशा लौटने की अदम्य चाहत के वक़्त ही होता है,
जब लौटना उतना ही मुश्किल होता है,
जितना बचपन और जवानी का लौटना। 

Monday, May 23, 2011

अल्लाह मियाँ



अल्लाह मियाँ कभी मुझसे मिलना
थोड़ा वक़्त निकाल के।
मालिश कंघी सब कर दूंगा, तेरा,
वक़्त निकाल के।

घूम के आओ गांव हमारे।
देख के आओ नद्दी नाले।
फटी पड़ी है वहाँ की धरती।
हौसले हिम्मत पस्त हमारे।
चाहो तो ख़ुद ही चल जाओ।
वरना चलना संग हमारे।

अल्लाह मियाँ कभी नींद से जगना
थोड़ा वक़्त निकाल के।
मालिश कंघी सब कर दूंगा, तेरा,
वक़्त निकाल के।

झांक के देखो,
खिड़की आंगन,
मेरा घर,
सरकार का दामन। 
ख़ाली बर्तन, ख़ाली बोरी,
ख़ाली झोली जेब है मेरी।

अल्लाह मियाँ ज़रा इधर भी देखो,  
मेहर तेरी उस ओर है।
भर कर रखा अन्न वहाँ पर,
पहरा जहाँ चहुँ ओर है।

अल्लाह मियाँ कभी ठीक से सोचो
थोड़ा वक़्त निकाल के।
मालिश कंघी सब कर दूंगा,
तेरा, वक़्त निकाल के।
..............................................
यह कविता समालोचन पर सर्वप्रथम प्रकाशित हुई। 

Saturday, May 21, 2011

बिक रहे हैं अख़बार



अब अख़बार पढ़ने से ज़्यादा बेचने के काम आते हैं।
मेरे सारे अख़बार बिक चुके हैं।
अख़बारों को बेचने के पैसे बहुत मिलते हैं।
और बिग बाज़ार में तो दाम तिगुने मिलते हैं।

पन्ने पर पन्ना छप रही है ख़बर,
क्यों कि लोग ख़रीद रहे हैं अख़बार।

पेपर की रिसाईक्लिंग के बाद
फिर से छपेगी ख़बर,
फिर से लोग ख़रीदेंगे,
और फिर से बिकेंगे अख़बार।
.......................................
यह कविता सर्वप्रथम समालोचन पर प्रकाशित हुई।  

Friday, May 20, 2011

बकरी



खेत में घास चरती बकरी
पास से गुज़रती हर ट्रेन को यूँ सिर उठा कर देखती है,
मानो पहली बार देख रही हो ट्रेन।
जैसे कोई देखता है गुज़रती बारात,
जैसे खिड़की से सिर निकाल कर कोई देखता है बारिश,  
जैसे एकाग्र हो कर सुनता है कोई तान। 

ट्रेन गुज़र जाने के बाद,
उस दृश्य आनन्द से निर्लिप्त वह,
चरने लग जाती है घास नये सिरे से।
.........................................
यह कविता समालोचन पर भी है।  

Thursday, May 19, 2011

जबकि ....... हूँ अकेला



हर फ़ैसले के वक़्त लगता है,
कोई ट्रेन छूट रही है,
कोई पीछे से आवाज़ लगा रहा है,
या कोई भागता हुआ आ रहा है रोकता।
मैं जबकि सवा अरब की भीड़ में खड़ा हूँ अकेला।  
..................................
इसे समालोचन पर भी देख सकते हैं।  

Wednesday, May 18, 2011

क्यों लगता है ऐसा



पता नहीं क्यों हर बार लगता है,
रेल पर सफ़र करते हुए
कि टीटी आएगा और टिकट देख कर कहेगा
कि आपका टिकट ग़लत है
या आप ग़लत गाड़ी में चढ़ गये हैं,
आपकी गाड़ी का समय तो कुछ और है,
तारीख़ भी ग़लत है,
आपने ग़लत प्लेटफ़ॉर्म से ग़लत गाड़ी पकड़ ली है,
आप उल्टी तरफ़ जा रहे हैं।
और वह चेन खींच कर उतार देगा
मुझे निर्जन खेतों के बीच।
……………………………
यह कविता सबसे पहले समालोचन पर पोस्ट हुई।

Wednesday, May 04, 2011

मुस्कुराहटें


हर कोई मुस्कुराता है
अपने अपने अर्थ के साथ।

बच्चा मुस्कुराता है,
तो लगता है, वह निर्भय है।
प्रेमिका मुस्कुराती है,
तो लगता है, उसे स्वीकार है मेरा प्रस्ताव।
दार्शनिक मुस्कुराता है,
तो लगता है, व्यंग्य कर रहा है दुनिया पर।
भूखा मुस्कुराता है,
तो लगता है, वह मुक्त हो चुका है और पाने को पड़ी है
उसके सामने पूरी दुनिया।

जब अमीर मुस्कुराता है,
तो लगता है, शासक मुस्कुरा रहा है,
कि देश की कमज़ोर नब्ज़ उसके हाथ में है,
कि जब भी उसे मज़ा लेना होगा,
दबा देगा थोड़ा सा। 

Wednesday, February 02, 2011

प्रेमिका के नाम

मैंने तुम्हारे खेत में जो धान रोपा था,
उसमें बाली आ गई है अब।
वह धूप में सोने की तरह चमकती है,
और हवाओं की सरसर में वैसे ही झुकती है,
जैसे तुम झुक आती हो मुझ पर।

Thursday, January 20, 2011

अपनी प्रेमिका के लिए


आदरणीय उदय जी के मशवरे से मैंने अपनी एक कविता का संपादन किया और अब यह इस प्रकार प्रस्तुत है।


जैसे गर्म भाप छोड़ती है नदी,
रोज़ उसमें नहाने वालों के लिए।
जैसे जाड़े की धूप
सेंकती है नन्हें पौधे को।
तुमने मुझे सेंका और पकाया है।


मैंने पूरी दुनिया को भर लिया है आज अपने अंक में।



Thursday, January 13, 2011

अम्मी का चूल्हा


मैं उस समय की बात कर रहा हूँ जब कोयले के चूल्हे जलते थे,

और छप्पर से धुँआ उठता था।


ईंट ईंट जोड़ कर अपने हाथों से अम्मी बनाती थीं मिट्टी का चूल्हा।

कुशल कारीगर की तरह अपने स्थापत्य में वे तल्लीन रहतीं।

इतनी तन्मयता तो कभी उनके सजने सँवरने में नहीं दिखी।


वह इस क़दर एकाग्रचित हो कर अपना हुनर दिखातीं,

मानो अपना घर बना रही हों।

वे असल में अपने घर बनाने की ऊर्जा ही यहाँ लगा रही थीं।

अपने घर की दीवारें, कमरें, दरवाज़े ही होते थे उनके मन में

जब वे चूल्हा बनाती थीं।


अगर होता, तो वह घर भी उतना ही सोंधा और लिपा पुता होता।

दो अलाव की तरह ही होता दो कमरा

और एक दरवाज़ा होता जहाँ से वे लाकर डालतीं कोयला

फिर पकता इतना खाना उस घर में

कि राज़ी ख़ुशी सबको पूरा पड़ता।


बहरहाल, नया चूल्हा बनने के बाद जो खीर बनती

वह उनके गृह प्रवेश की ही खीर होती थी।

गीली मिट्टी की महक और खीर के स्वाद में उनकी प्रतिभा का सुख था।


रात को थपकी देकर चूल्हे को सुला देतीं

और चूल्हा भी मानो पालकी में सोया कोई बच्चा बन जाता।

फिर वे ख़ुद भी थक कर सो जातीं।


उन्हें सपनों में चूल्हा आता,

नये नये निर्माण के तरीक़े आते।

खोरनी आती, फूँकनी आती, परेशान करने वाला धुँआ आता।

वे बड़बड़ाती जातीं; डोई के रखने की जगह बनानी है।

अभी तो दल-घोटनी के टांगने के लिए भी कील चाहिए।

अदहन उतार कर दाईं तरफ़ रखें या बाईं तरफ़ ?

...........और रात कट जाती।


जब से गैस का चूल्हा आया, उनका निर्माण कौशल जाता रहा।

फिर से एक बार चूल्हा बनाने का उनका सपना

सपना ही रह गया।


गुज़रते हुए वक़्त के साथ अब तो उनकी शक्ल में ही दिखने लगा है चूल्हा।

दो सूने अलाव की तरह सूनी दो आँखें,

टिकी रहती हैं अशोक राजपथ पे कोयले का इंतज़ार करती हुई।

सपनों में ही वे अब बना पातीं हैं; दो अलाव की तरह दो कमरा, एक दरवाज़ा।

सपनों में ही ख़रीदकर ले आतीं हैं कोयला और रात गुज़र जाती है।

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इस कविता को फ़ेसबुक पर भी देखा जा सकता है।

Wednesday, January 05, 2011

नानी



मैं रोने का हक़ भी न अदा कर सका।
मैं जनाज़े पे उनके जा न सका।
वक़्ते रुख़्सत अगर न मिलो किसी से।
सुना है सपने में उसका वुजूद ज़िन्दा रहता है सदा।
तभी तो, वे सब उठ उठ के आते हैं मेरे पास।
जैसे आता है धधकते ईंजन में कोयला झोंकने गाड़ीवान।
और चल पड़ता हूँ मैं पटरी थाम। तेज़ गाम।