अशोक राजपथ
अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब। - मुक्तिबोध।
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Thursday, May 19, 2011
जबकि ....... हूँ अकेला
हर फ़ैसले के वक़्त लगता है,
कोई ट्रेन छूट रही है,
कोई पीछे से आवाज़ लगा रहा है,
या कोई भागता हुआ आ रहा है रोकता।
मैं जबकि सवा अरब की भीड़ में खड़ा हूँ अकेला।
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इसे
समालोचन
पर भी देख सकते हैं।
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